सरदार वल्लभभाई पटेल की जानकारी, जीवनी और निबंध

नमस्ते दोस्तों, आज के इस लेख में सरदार वल्लभभाई पटेल की जानकारी (Sardar Vallabhbhai Patel Information In Hindi) आपको देंगे। आज के इस लेख में आपको सरदार वल्लभभाई पटेल की जीवनी और निबंध (Sardar Vallabhbhai Patel Biography and Essay in Hindi) मिलेगा।

सरदार वल्लभभाई पटेल एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे हर कोई पसंद करता था। आज उन्ही के वजह से भारत एक है।


Sardar Vallabhbhai Patel : Information, Biography And Essay In Hindi


सरदार वल्लभभाई पटेल इनकी स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ी भूमिका थी। लेकिन भारत के स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद जो काम उन्होंने किया वह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

भारत के स्वतंत्र होने से पहले जो भारत का नक्शा था वह दो रंगों में बटा हुआ था। जोकि था गुलाबी और पिला था। गुलाबी रंग भारत के उन जगहों को दर्शाता था जो ब्रिटिश शासन के अधीन थे।

और पीला रंग उन जगहों को दर्शाता था जहां पर राजा और राजकुमारों का शासन था। पीले रंग में कुल मिलाकर 556 छोटी रियासतें थी। इन रियासतों को ब्रिटिश सरकार ने विभाजन के बाद विकल्प दिए थे कि या तो वे भारत से जुड़ जाए या फिर नए बने हुए पाकिस्तान से जुड़े।

१९४७ में स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल को होम मिनिस्टर नियुक्त किया गया। उन्हें यह काम सौंपा गया कि वह उन सभी रियासतों को भारत में मिलाएं जिन पर राजा और राजकुमारों का शासन है।

सरदार पटेल ने बातचीत, सुलह, तुष्टीकरण, धन का इस्तेमाल करके यहां तक कि उन्होंने बल का इस्तेमाल करके भी राजाओं द्वारा शासित रियासतों को भारत में मिला दिया।

सरदार पटेल को सिर्फ हैदराबाद के निजाम में समस्या पैदा हुई लेकिन पुलिस का इस्तेमाल करके जो कार्यवाही की उससे सरदार पटेल की इच्छाओं के अनुसार उन समस्याओं का निदान हो गया।

और इस तरह एक मजबूत भारत का निर्माण हुआ। यह काफी मुश्किल काम था जोकि असंभव लग रहा था। लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी चतुराई का इस्तेमाल करके इस काम को अंजाम दिया। और उनके इसी काम के वजह से उन्हें आयरन मैन ऑफ इंडिया कहा जाता है।

सरदार पटेल जी का जन्म ३१ अक्टूबर १८७५ मैं हुआ था। उनका जन्म गुजरात की नाडियाड में हुआ था। सरदार पटेल एक अच्छे जमीदारों के परिवार से थे। जिनकी जाति लेवा पाटिल थी।

परिवार मैं चौथे पुत्र होने के कारण उन्हें हमेशा ही नजरअंदाज किया जाता था। लेकिन वे एक ऐसे इंसान थे जिनकी इच्छा शक्ति बहुत मजबूत थी।

सरदार वल्लभभाई पटेल की शादी उनके १६ साल के उम्र में हो गई थी। सरदार पटेल इंग्लैंड जाकर कानून की शिक्षा लेना चाहते थे। लेकिन उनका परिवार उसका खर्च नहीं उठा सकता था।

सरदार पटेल ने २२ साल की उम्र में जब उनकी मैट्रिक पूरी करली तो उसके बाद उन्होंने जिला याचिकाकर्ता की परीक्षा देकर उसमें उत्तीर्ण हो गए। जिसने उन्हें कानून का अभ्यास करने में मदद की।

सरदार पटेल ने १९०० में गोधरा में जिला याचिकाकर्ता का एक कार्यालय स्थापित किया। उसके बाद गुजरात के खेड़ा जिले के बोरसद में चले गए।

१९०८ में सरदार पटेल जी के पत्नी की मृत्यु हो गई। सरदार वल्लभभाई पटेल को एक बेटा और एक बेटी थी। सरदार पटेल १९१० में मिडलटन जो कि लंदन में है वहां अध्ययन के लिए गए। और जब वह परीक्षाओं को काफी अच्छे गुणों के साथ पास कर गए तो वह फरवरी १९१३ में भारत लौट आए।

भारत लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद बार में अपना अभ्यास शुरू कर दिया। और देखते ही देखते वह आपराधिक कानून में एक प्रसिद्ध बैरिस्टर बन गए।

सरदार पटेल को उनके तौर-तरीके और कपड़े पहनने की पश्चिमी शैली के लिए भी जाना जाता था। सरदार पटेल फैशनेबल गुजरात क्लब के सदस्य भी थे। सरदार पटेल १९१७ को पहली बार भारतीय राजनीति की ओर आकर्षित हुए। यह वह समय था जब गांधीजी ने राजनीति में प्रवेश किया था।

गांधीजी चाहते थे कि प्रत्येक क्षेत्र के लोग जो कि शिक्षित है वह भी उनके आंदोलन का एक हिस्सा बन जाए। गांधी जी ने बिहार में डॉ राजेंद्र प्रसाद और अन्य वकीलों को अपने साथ मिला लिया था। गांधीजी नेहरू परिवार के साथ जो कि उत्तर प्रदेश से थे उनसे काफी निकटता से जुड़े हुए थे। और जब गुजरात की बारी आई तो गांधीजी सरदार पटेल के पास गए।

जब सभी नेताए गांधी जी के साथ जुड़ गए तो उन्होंने अपना अभ्यास छोड़ दिया। और अभ्यास छोड़ने के बाद स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए।

सरदार पटेल गांधी जी और उनके सत्याग्रह आंदोलन से काफी प्रभावित थे। सरदार वल्लभभाई पटेल ने गांधी जी का सभी नीतियों में समर्थन नहीं किया। लेकिन उन्होंने गांधीजी को समर्थन करने का संकल्प कर लिया था।

सरदार पटेल ने पश्चिमी वस्त्र ना पहने का निर्णय किया और वस्त्रों को त्याग दिया। सरदार पटेल भारतीय किसान के सफेद कुर्ता और धोती पहनने लगे। उस वक्त सरदार पटेल ने गुजरात क्लब को भी छोड़ दिया। सरदार पटेल १९१७ में अहमदाबाद के पहले भारतीय नगर पालिका के आयुक्त बने।

सरदार पटेल १९२४ तक अहमदाबाद के भारतीय नगरपालिका के आयुक्त पद पर रहे। उसके बाद १९२४ से १९२८ तक वह इस के निर्वाचित नगर पालिका अध्यक्ष बने। सरदार पटेल ने १९२८ को एक बड़ी रैली का आयोजन किया जिसमें कैरा जिले के सभी किसान और जमीदारों को इकट्ठा किया।

इस रैली को आयोजित करने का कारण था कि, भारी बारिश के कारण फसल की खराबी के बावजूद पूर्ण वार्षिक करो को इकट्ठा करने के मुंबई सरकार के फैसले का विरोध करना सरदार पटेल ने १९२८ में बारडोली के जमीदारों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। यह प्रदर्शन बड़े हुए कर के विरोध में किया जा रहा था।

यह एक सफल अभियान रहा और इस अभियान ने उन्हें सरदार की उपाधि दिलाई। बाकी सभी राजनीतिक नेताओं की तरह उनका भी स्वतंत्र दृष्टिकोण था। स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती वर्षों में उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रा के बजाय भारत के लिए डोमिनियन का दर्जा प्राप्त करने में विश्वास किया।

सरदार पटेल का मानना था सशस्त्र क्रांति से बचना चाहिए। क्योंकि इससे गंभीर दमन होगा और दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू जी का इसके विपरीत मानना था।

और गांधीजी के विपरीत, सरदार पटेल ने यह नहीं माना कि हिंदू मुस्लिम एकता स्वतंत्रा के लिए एक शर्त थी। उन्होंने अपने परिवार से पारंपरिक मूल्यों का ग्रहण किया था। इसलिए वे भारत के लिए एक समाजवादी पैटर्न को अपनाने में विश्वास नहीं करते थे।

१९२९ के लाहौर सत्र में, राष्ट्रपति पद के लिए गांधीजी के बाद सरदार पटेल दूसरे उम्मीदवार थे। जब सरदार पटेल को अध्यक्ष पद के लिए नियुक्त किया गया था। तो उस वक़्त गांधी जी ने नेहरू जी से उनकी इच्छा पूछी। उस वक्त नेहरू जी कुछ भी नहीं बोली।

इससे गांधी जी समझ गए कि नेहरू जी कांग्रेस के अध्यक्ष बनना चाहते हैं। और यह देखते हुए गांधीजी ने सरदार पटेल को मजबूरन अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवारी वापस लेने को कहा।

सरदार पटेल गांधीजी की बहुत इज्जत करते थे इसलिए उन्होंने गांधीजी के एक बार कहने से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। और नेहरू जी को कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। जो आगे चलकर भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने वाले थे।

१९३० में उन्हें नमक सत्याग्रह के दौरान ३ महीने की कैद हुई। सरदार पटेल ने १९३१ में कांग्रेस के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता की। उन्हें अगले ही वर्ष जनवरी में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जुलाई १९३४ में रिहा किया गया।

जैसे ही सरदार पटेल रिहा हुए उन्होंने १९३७ के चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए जोरदार प्रचार किया। सरदार पटेल सत्र १९३७-३८ मैं कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए मुख्य दावेदार थे। लेकिन इस बार फिर गांधी जी के कहने पर सरदार पटेल ने अध्यक्ष पद से अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लि और फिर से एक बार जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष बने।

सरदार पटेल ने हमेशा विवेक और चातुर्य के साथ काम किया और गांधीजी के कूटनीतिक के साथ उनकी इच्छाओं को स्वीकार किया। वह हमेशा नेहरू जी के साथ उनके पीछे बने रहे।

सरदार पटेल और अन्य कांग्रेस नेताओं को अक्टूबर १९४० में कैद कर लिया गया। और अगस्त १९४१ में फिर से रिहा कर दिया गया। सरदार पटेल को अगस्त १९४२ से जून १९४५ के बीच फिर से जेल में डाल दिया गया।

जब द्वितीय विश्वयुद्ध में जापानियों ने भारत पर हमला कर दिया तो उन्होंने गांधीजी के अहिंसा को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि विभाजन देश के हितों में था।

एक बार फिर गांधी जी के हस्तक्षेप के कारण प्रमुख उम्मीदवार होने के बावजूद सरदार पटेल कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बन पाए। और एक बार फिर जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद ब्रिटिश सरकार ने अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। भारत देश को १९४७ में स्वतंत्रता मिली। लेकिन जिन्ना और मुस्लिम लिग के आदर्शों को पूरा करने के लिए देश को विभाजित किया गया।

उस वक्त हैदराबाद और जूनागढ़ के अलावा कुछ अन्य रियासतों में मुस्लिम शासक थे। सरदार पटेल के प्रयासों के कारण वे भारत संघ में शामिल होने के लिए सहमत हुए। लेकिन कश्मीर के हालात अलग थे।

पहले कश्मीर ने पाकिस्तान के साथ अपनी सीमाओं को साझा किया। क्योंकि कश्मीर के ज्यादातर लोग मुस्लिम थे और शासक हिंदू था। जवाहरलाल नेहरू के पूर्वज और माता-पिता कश्मीर से थे। इसलिए वह कश्मीर के मामलों की देखभाल करते थे।

कश्मीर में चलती संवेदनशील स्थिति को देखते हुए पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया। उस वक्त पाकिस्तान से अपनी रियासत बचाने के लिए राजा हरि सिंह ने भारत के साथ जुड़ने का फैसला किया।

जब राजा हरि सिंह ने समझौते पर हस्ताक्षर किए तो सरदार पटेल ने कश्मीर में घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी आर्मी से राज्य को बचाने के लिए भारत के सेना को श्रीनगर भेज दिया।

लेकिन कश्मीर से पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह से बाहर निकालने से पहले संघर्ष विराम घोषित कर दिया गया। जिस वजह से कश्मीर का लगभग एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान द्वारा हड़प लिया गया।

तब से लेकर १९४७ और १९४८ के बाद भी पाकिस्तान ने भारत पर २ बार हमला किया और तब से पाकिस्तान इंडिया के बीच में हालात अच्छे नहीं है।

पाकिस्तान के पास सिर्फ यही बहाना है कि कश्मीर मैं ज्यादातर मुसलमान है। कुछ राजनेताओं का मानना है कि अगर सरदार पटेल को कश्मीर का मामला सौंप दिया जाता तो आज स्तिथि भारत के पक्ष में होती।

सरदार पटेल के जीवन की महत्वाकांक्षा अखंड भारत थी। स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल ने बड़े ही उत्साह के साथ देश के कल्याण के लिए काम किए।

सरदार पटेल के लिए गांधीजी की हत्या एक बहुत बड़ा आघात था। सरदार पटेल गांधीजी की बहुत इज्जत करते थे। उन्हें गांधीजी से बहुत प्रेम था। सरदार पटेल गांधी जी को अपना बड़ा भाई और गुरु मानते थे।

सरदार पटेल १९४७ और १९५० के बीच उप प्रधानमंत्री, गृह मामलों के मंत्री, सूचना मंत्री और राज्य के मंत्री थे। १५ दिसंबर १९५० को उनकी मृत्यु हुई। इस दिन पूरा देश शोक में डूबा था।

२० वीं शताब्दी में पूरे भारत को एकजुट करने के लिए जो उन्होंने किया वह अद्वितीय है। अगर उस समय सरदार वल्लभभाई पटेल नहीं होते तो आज भी भारत टुकड़ों में होता। उनका भारत के प्रति प्रेम और किए गए कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वह सही में आयरन मैन ऑफ इंडिया थे।


तो दोस्तों यह थी सरदार वल्लभभाई पटेल जी की कहानी और पूरी जानकारी (Sardar Vallabhbhai Patel Information In Hindi) । आप चाहे तो इस जानकारी को सरदार वल्लभभाई पटेल जी के निबंध (Sardar Vallabhbhai Patel essay In Hindi) के लिए इस्तेमाल कर सकते है। या फिर आप इस जानकारी को सरदार वल्लभभाई पटेल जी की जीवनी (Sardar Vallabhbhai Patel biography In Hindi) लिखने के लिए इस्तेमाल कर सकते है।

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